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लोकतंत्र की आत्मा और जनता की इच्छाओं का सर्वोच्च मंच है भारतीय संसद

गुरुग्राम। भारतीय संविधान के अनुसार संसद देश की केंद्रीय विधायिका है। यह न केवल कानून बनाने का सर्वोच्च मंच है, बल्कि सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय नीतियों पर गंभीर विचार-विमर्श करने का केंद्र भी है। उक्त विचार वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद ने संविधान जागरूकता श्रृंखला के अगले अध्याय में भारतीय संविधान के अंतर्गत संसद की भूमिका और उसके महत्व पर व्यक्त किए। भारतीय संविधान जनता को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भागीदारी का अधिकार देता है। इसी उद्देश्य से संसद की स्थापना की गई है, जो देश की सर्वोच्च विधायिका है और लोकतंत्र की आत्मा का प्रतीक है।  
तीन स्तंभों से मिलकर बनती है संसद
एडवोकेट कैलाश चंद ने संसद की संरचना को स्पष्ट करते हुए कहा कि संविधान के अनुसार संसद किसी एक सदन से नहीं, बल्कि तीन महत्वपूर्ण अंगों राष्ट्रपति, लोकसभा व राज्यसभा से मिलकर बनती है। इन तीनों अंगों की आपसी सहभागिता और समन्वय से ही देश की विधायी प्रक्रिया पूरी होती है। लोकसभा के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इसे जनता का सदन कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे देश के नागरिकों द्वारा चुनकर आते हैं। सरकार के गठन में लोकसभा की भूमिका निर्णायक होती है और देश की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसी सदन के प्रति जवाबदेह होती है। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा को भारतीय संघीय व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बताते हुए उन्होंने कहा कि यह सदन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है और कानून निर्माण की प्रक्रिया में एक आवश्यक संतुलन बनाए रखता है।
कानून निर्माण से लेकर वित्तीय नियंत्रण तक
कैलाश चंद ने बताया कि संसद के पास देश के विकास और व्यवस्था को चलाने की व्यापक शक्तियां हैं। किसी भी नए कानून या विधेयक पर दोनों सदनों में गहन चर्चा होती है। आवश्यक स्वीकृतियों के बाद, जब राष्ट्रपति उस पर अपनी मंजूरी देते हैं, तभी वह विधेयक देश का कानून बनता है। देश के राजस्व और व्यय पर संसद का पूरा नियंत्रण होता है। सरकार का वार्षिक बजट संसद में ही पास होता है, और इसकी मंजूरी के बिना सरकार सार्वजनिक धन का एक भी रुपया खर्च नहीं कर सकती।
सरकार की जवाबदेही और लोकतंत्र का सशक्त मंच
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि संसद सिर्फ कानून बनाने की मशीन नहीं है, बल्कि यह सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखने का सबसे बड़ा माध्यम है। प्रश्नकाल, शून्यकाल, विभिन्न चर्चाओं और संसदीय समितियों के जरिए सरकार के हर काम की बारीकी से समीक्षा की जाती है। संसद देश के हर क्षेत्र, वर्ग और विचारधारा को अपनी बात रखने का अवसर देती है। कैलाश चंद एडवोकेट ने कहा कि भारतीय संसद हमारे लोकतंत्र की असली आधारशिला है। यह जनता की आकांक्षाओं को नीतियों का रूप देती है और राष्ट्र के विकास की दिशा तय करती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक सशक्त और जागरूक संसद ही एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।