गुरुग्राम। आषाढ़ मास की पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया। अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए सुबह से ही मंदिरों, आश्रमों और शिक्षण संस्थानों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। सनातन परंपरा में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। उज्जैन महाकाल मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी विवेकानंद महाराज के गुरुग्राम स्थित पर्णकुटि आश्रम आगमन पर श्रद्धालुओं ने उनका आशीर्वाद लिया। स्वामी विवेकानंद महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी उच्च दर्जा दिया गया है। बदलते आधुनिक दौर और डिजिटल युग में भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण, सही दिशा-निर्देशन और नैतिक मूल्यों के विकास में गुरु की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है। आध्यात्मिक विचारकों, शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि जीवन में सफलता और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए एक सच्चे गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है। जो व्यक्ति को अज्ञानता रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए, वही गुरु है। गुरु केवल किताबी शिक्षा देने वाला शिक्षक ही नहीं, बल्कि जीवन की विषम परिस्थितियों में सही और गलत का अंतर समझाने वाला सच्चा मार्गदर्शक होता है। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा भारत की वह अनमोल धरोहर है जिसने सदियों से समाज का मार्गदर्शन किया है। माता-पिता बच्चे के प्रथम गुरु होते हैं, जो उसे जन्म और संस्कार देते हैं, जबकि शिक्षा देने वाले शिक्षक और आध्यात्मिक गुरु उसे जग में जीने योग्य बनाते हैं। इसलिए गुरु के प्रति आदर, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव रखना ही मानव जीवन का सच्चा कर्तव्य है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार गुरु पूर्णिमा तिथि पर प्रथम गुरु और महान ग्रंथ महाभारत, चार वेदों तथा 18 पुराणों के रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। उन्होंने मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य भंडार सौंपा, इसीलिए इस दिन सबसे पहले महर्षि वेदव्यास जी का पूजन कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों जैसे वाराणसी, हरिद्वार, मथुरा, और ऋषिकेश में सुबह से ही पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का दौर जारी है। विभिन्न आश्रमों में शिष्यों ने अपने-अपने गुरुओं के चरण पखारकर उनका आशीर्वाद लिया। प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्रों पर विशेष सत्संग, महायज्ञ और भंडारे का आयोजन किया गया है, जहाँ श्रद्धालुओं को गुरु वाणी और भजनों का आनंद मिल रहा है। गुरु पूर्णिमा का यह दिन हमें अपनी महान भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़े रहने की सीख देता है।
अज्ञानता का अंधकार मिटाकर ज्ञान का अलख जगाते हैं गुरु : स्वामी विवेकानंद महाराज

