गुरुग्राम। प्रभु का नाम केवल बार-बार रटना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नाम के माध्यम से वास्तविक प्रभु स्मरण होना चाहिए, तभी सच्चा स्मरण और भजन सिद्ध होता है। उक्त विचार गीता ज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने अनुयायियों को प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि नाम-जप तब वास्तविक रूप से भजन बनता है जब भगवान का नाम जीवन का रस बन जाए और मन उसमें पूरी तरह डूबने लगे। जब यह नाम-मन्त्र जाप मनुष्य को भगवान के आनंद और रस में डुबो देता है, तब इंद्रियां स्वत: ही वश में हो जाती हैं और जीवन में संयम का अपने आप घटित होना शुरू हो जाता है। इसके प्रभाव से शरीर और सांसारिक भोगों की इच्छाएं धीरे-धीरे घटने लगती हैं और विकारों की शुद्धि अपने आप होने लगती है। आज की धार्मिक प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भजन, भक्ति, पाठ और व्रत भी किट्टी पार्टियों की तरह आयोजित होने लगे हैं, जहाँ नाना प्रकार के पकवानों का बनना आवश्यक होता जा रहा है। उन्होंने इसे हाथी के स्नान की उपमा देते हुए समझाया कि जिस प्रकार हाथी सरोवर में स्नान तो करता है, लेकिन बाहर निकलते ही अपनी सूंड से अपने ऊपर पुन: मिट्टी डाल लेता है, वही स्थिति आज के दिखावे वाले कर्मकांड की हो गई है। इसी संदर्भ में सच्चे सद्गुरु हमेशा सावधान करते हैं और भक्तों की हां में हां नहीं मिलाते, अन्यथा मन रूपी हाथी का वह स्नान पूरी तरह व्यर्थ हो जाता है। स्वामी जी ने आह्वान किया कि फैशनेबल और आधुनिक तौर-तरीकों को त्यागकर शास्त्रों में बताए गए शास्त्रीय विधान के अनुसार ही सच्ची भजन-भक्ति करनी चाहिए। अपनी मनमर्जी को कभी भी वास्तविक साधना या भावना नाम का रूप न दें, तभी जीवन में आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
प्रभु नाम का स्मरण केवल रटना ही नहीं, अपितु आंतरिक बदलाव का है माध्यम : डॉ. स्वामी दिव्यानंद महाराज

