गुडग़ांव, पिछले एक वर्ष से देश के किसान केंद्र सरकार
द्वारा बनाए गए तीनों कानूनों को वापिस लेने की मांग करते हुए दिल्ली की
सीमाओं पर डटे हुए हैं। हालांकि केंद्र सरकार व किसान संगठनों के साथ 11
दौर की वार्ताएं इन कानूनों को लेकर हो भी चुकी थी, लेकिन जनवरी माह में
हुई हिंसात्मक घटना के बाद वार्ताओं का दौर समाप्त हो गया था। किसान फिर
भी दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। किसान आंदोलन को एक वर्ष पूरा होने जा
रहा था, इसी दौरान गत 19 नवम्बर को प्रकाश पर्व पर इन कानूनों को वापिस
लेने की घोषणा प्रधानमंत्री ने कर दी थी। प्रधानमंत्री की इस कार्यवाही
को देशवासी अपने-अपने तरीके से देख रहे हैं। प्रधानमंत्री ने दरियादिली
दिखाते हुए देश, समाज व किसान हित में इन कानूनों को वापिस लिया है। कुछ
लोग इसे प्रधानमंत्री की कमजोरी भी बता रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
भ्रष्टाचार उन्मूलन में जुटी संस्था क्राईम रिफार्मर एसोसिएशन के
राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी को 20 वर्ष से अधिक सत्ता में रहने का अनुभव है। कैसे भी हालात रहे
हों, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी के सामने घुटने नहीं टेके। इसलिए ये
कहना गलत है कि वे कमजोर पड़ गए और उन्होंने पहली बार इतने बड़े मंच पर
खड़े होकर माफी मांगी है। डा. कटारिया का कहना है कि यह प्रधानमंत्री का
बडप्पन है। देर में ही सही उनके द्वारा लिया गया यह निर्णय सराहनीय व
स्वागत योग्य है। उनकी आलोचना करने वाले लोगों को उनकी इस घोषणा को उनकी
कमजोरी के रुप में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रहित और किसान हित
में ही यह निर्णय लिया है जिसकी लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे। हालांकि
इन कानूनों का भाजपा के कुछ सांसद भी विरोध कर रहे थे और उनका मानना था
कि प्रधानमंत्री इसमें हस्तक्षेप करें। प्रधानमंत्री ने सभी की भावनाओं
की कद्र करते हुए यह निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री की इस घोषणा को कुछ
प्रदेशों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से भी जोडक़र देखा जा रहा है।
चाहे कुछ भी हो प्रधानमंत्री ने उपजी परिस्थितियों व देश के हालात को
देखते हुए ही यह निर्णय लिया है। मोदी कृषि कानून वापिस लेंगे इसकी
उम्मीद किसानों व विपक्षी लोगों को भी नहीं थी। उनकी भावी योजनाओं पर भी
उनकी इस घोषणा ने पानी फेर कर रख दिया है।

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