गुरुग्राम।, अल्लाह की राह में कुर्बानी की याद दिलाता है
ईद-उल-जुहा का पर्व। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसमें सभी समुदायों
को अपने-अपने पर्व धूमधाम से मनाने की पूरी स्वतंत्रता है। विभिन्न
समुदाय के लोग एक दूसरे के पर्वों में जहां बढ़-चढक़र भाग लेते रहे हैं,
वहीं भ्रातृत्व की भावना को भी मजबूत करते सदियों से दिखाई दे रहे हैं।
यह कुर्बानी का त्यौहार है। जो समुदाय के लोग अल्लाह की राह तमें देते
हैं। समुदाय के लोगों का कहना है कि हजरत इब्राहिम उनके पैगंबर थे।
अल्लाह ने एक बार उनका इम्तिहान लेने का सोचा। उनसे ख्वाब के जरिये अपनी
सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। हर पिता की तरह हजरत इब्राहिम को भी
अपने बेटे इस्माईल से बड़ी मोहब्बत थी। क्योंकि इस्माईल उनके इकलौते बेटे
थे और वह काफी वक्त के बाद पैदा हुए थे। पैगम्बर इब्राहिम ने फैसला लिया
कि इस्माईल से ज्यादा उनका कोई और प्रिय नहीं है और उन्होंने इस्माईल को
ही कुर्बान करने का फैसला लिया। कहा जाता है कि हजरत इब्राहिम जब बेटे को
लेकर कुर्बानी देने जा रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात शैतान से हो
गई। उसने जानना चाह कि इब्राहिम अपने बेटे को लेकर कहां जा रहे हैं।
इब्राहिम ने जब उन्हें बताया कि वह अपने बेटे को अल्लाह की राह में
कुर्बान करने के लिए लेकर जा रहे हैं तो शैतान ने उन्हें यह समझाने की
कोशिश की कि क्या कोई अपने बेटे की भी कुर्बानी देता है। यदि बेटे की
कुर्बानी दे दी तो फिर उनकी देखभाल कौन करेगा। शैतान ने कहा कि जरुरी
नहीं कि बेटे की ही कुर्बानी दी जाए और भी अन्य चीजें हैं उन्हें ही अपनी
प्रिय बताकर कुर्बानी क्यों नहीं दे देते। हजरत इब्राहिम को लगा कि यह
शैतान जो कह रहा है वह सही ही कह रहा है और उनका मन भी विचलित हो गया,
लेकिन फिर उन्हें लगा कि ऐसा करना गलत होगा। कहा जाता है कि हजरत
इब्राहिम ने बेटे की कुर्बानी देते हुए उन्होंने अपनी आंख में पट्टी बांध
लेना ही बेहतर समझा, ताकि बेटे का मोह कहीं अल्लाह की राह में कुर्बानी
में बाधा न बन जाए।

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