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कैप्टन विक्रम बतरा ने कारगिल युद्ध में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की

गुडग़ांवI आजादी का 75वां अमृत महोत्सव देशवासी मना रहे हैं, जिसमें शहीदों, क्रांतिकारियों व स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जा रहा है। कारगिल के युद्ध में भी भारतीय सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। भारतीय सेना के कैप्टन विक्रम बतरा की पुण्यतिथि पर
उन्हें याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि कैप्टन बतरा ने कारगिल युत्र में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उन्हें
मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका जन्म पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को को हुआ था। परिवार धार्मिक प्रवृति का था। जन्म के समय जुड़वां भाई थे।

एक का नाम लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल रखा। वह संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर सेना में भर्ती हो गए थे। उन्हें 6 दिसम्बर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया था। 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी कैप्टन बतरा की टुकड़ी को मिली। वक्ताओं ने बताया कि उन्होंने बड़ी निडरता से शत्रु पर धावा बोल दिया और आमने-सामने की लड़ाई में शत्रुओं के 4 सैनिकों को मार डाला और 20 जून 1999 को अपना कब्जा कर लिया था। उन्हें कारगिल के शेर की संज्ञा भी दी गई थी।

शत्रु सैनिकों से लड़ते हुए वह गंभीर रुप से घायल भी हो गए थे। कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौंत के घाट उतार देने के बाद यह जांबाज सैन्य अधिकारी भी वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने शत्रुओं का सफाया करते हुए प्वाईंट 4875 चोटी पर भी कब्जा कर लिया था। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने सर्वोच्च परंपराओं के अनुरुप अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। ऐसे जांबाज सैन्य अधिकारियों के बल पर ही आज देशवासी अपने घरों में सुरक्षित हैं। 7 जुलाई 1999 को उनका निधन हो गया था।

Comments (3)

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