गुडग़ांव। उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी गोविंद वल्लभ पंत को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए वरिष्ठ श्रमिक नेता कुलदीप जांघू ने कहा कि वह देश के गृहमंत्री भी रहे थे। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और जमींदारी प्रथा को खत्म कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। भारत रत्न का सम्मान उनके ही गृहमन्त्रित्व काल में आरम्भ किया गया था। बाद में यही सम्मान उन्हें 1947 में उनके स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान देने, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा भारत के गृहमंत्री के रूप में उत्कृष्ट कार्य करने के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रदान किया गया।
उन्होंने बताया कि उनका जन्म 10 सितम्बर 1887 को वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के खूंट (धामस) नामक गाँव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने उच्च शिक्षा इलाहबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। छात्र जीवन में ही वह पंडित जवाहरलाल नेहरु, मोतीलाल नेहरु, सर तेजबहादुर सपरु, सतीशचंद्र बनर्जी व सुंदरलाल ख्याति प्राप्त नेताओं के संपर्क में आ गए थे। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युवाओं को जागरुक भी किया था, जिसके कारण उन्हें जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी। असहयोग आंदोलन में भी उनका बड़ा योगदान रहा था। स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का अभियान भी उन्होंने देशवासियों के साथ मिलकर चलाया था। वर्ष 1946 से दिसम्बर 1954 तक उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे थे। उन्होंने जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाया था और भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि भी दिखाई थी। वह कानून ज्ञाता होने के साथ ही महान नेता व अर्थशास्त्री भी थे। 7 मार्च 1961 को उनका निधन हो गया था। श्रमिक नेता ने कहा कि देश के युवाओं को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।


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