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मेजर पीरु सिंह को भारत-पाक युद्ध में वीरता के लिए मरणोपरांत दिया गया परमवीर चक्र सम्मान

गुडग़ांवI भारतीय सेना देश की सीमाओं की रक्षा करने में जुटी हैं। वीर सैन्यकर्मियों की बदौलत ही देशवासी निश्चित होकर अपने घरों
में आराम की नींद लेते हैं। इन सैनिकों ने विषम से विषम परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। 1947 के भारत-पाक युद्ध में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले राजस्थान  मूल के कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए पूर्व सैन्यकर्मियों ने कहा कि उन्हें 1952 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। शत्रु के सामने वीरता प्राप्त करने के लिए दिया जाने वाला यह सर्वोच्च भारतीय सम्मान है।

वक्ताओं ने कहा कि पीरू सिंह का जन्म 20 मई 1918 को राजस्थान के बेरी गांव में हुआ था। शिक्षा के प्रति उनकी विशेष रुचि नहीं रही। वह भारतीय सेना में शामिल हो गए। सेना में कुछ परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें लांस नायक के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। उन्होंने सैन्यकर्मियों को प्रशिक्षक के रुप में भी अपनी सेवाएं दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें जापान भी भेजा गया था। 18 जुलाई 1948 को उन्हें जम्मू कश्मीर के तिथवाल में शत्रुओं का सामना करने के लिए भेजा गया था। वक्ताओं ने बताया कि हमले के दौरान उनकी टुकड़ी पर हथगोले भी फैंके गए थे। उनकी टुकड़ी के आधे से अधिक सैनिक मारे गए या घायल हो गए थे। घायल होने के बावजूद भी पीरु सिंह ने दुश्मनों के 2 बंकरों को बर्बाद कर दिया था। इसी दौरान वे भी गंभीर रुप से घायल हो गए थे और वे दुश्मनों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

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