गुरुग्राम। भगवान गणपति की मूर्ति केवल मोहल्लों और पंडालों तक सीमित रखने या स्थापित करने भर का साधन नहीं है, बल्कि यह धर्म और जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने का एक गहरा संकेत है। श्री गणपति महोत्सव मूर्ति पूजा से आगे बढक़र जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने का संदेश है। उक्त विचार गीताज्ञानेश्वर डॉ. स्वामी दिव्यांद महाराज भिक्षु ने गणेशोत्सव के असली और गहरे अर्थ के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि पूर्ण परमात्मा को समझने के लिए हमारे शब्द अपूर्ण हैं और हमारी बुद्धि की भी एक निश्चित सीमा है। जब वेदों ने भी नेति-नेति कहकर अपनी असमर्थता जता दी है, तब केवल तर्क के आधार पर पूर्णता को तौलना एक प्रकार का खोखला अहंकार ही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि क्या एक किलो की बुद्धि वाले बर्तन में संपूर्ण समुद्र समा सकता है? यह सवाल आधुनिक युग के उस मिथ्या अहंकार पर करारा प्रहार करता है जहाँ लोग बिना आध्यात्मिक गहराई के हर बात पर तर्क की जिद करते हैं। महाराज जी का कहना है कि भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, लेकिन इस संदेश में विघ्न का बहुत ही अनूठा और व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है। व्यक्ति के जीवन के असली विघ्न बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे विकार हैं—जैसे क्रोध, र्ईष्र्या, द्वेष, लोभ, भय, अहंकार और छोटी-छोटी बातों को बड़ा बनाकर सोचते रहना। इन्हीं नकारात्मकताओं के कारण मनुष्य रातभर सो नहीं पाता और फिर अपने भाग्य या किसी ग्रह-नक्षत्र को दोष देता है। उन्होंने कहा कि श्री गणेश को केवल पंडाल में नहीं, बल्कि अपने आचरण और जीवन में बिठाना चाहिए। भगवान गणेश की तरह अपनी सोच और मस्तक को बड़ा बनाना ही असली पूजा है। जब व्यक्ति अपनी छोटी सोच और विकारों को त्याग देता है, तो उसके जीवन के सभी स्वत: ही दूर हो जाते हैं और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।
व्यक्ति के जीवन में बाहरी नहीं, अपितु अंदर छिपे विकार हैं असली विघ्र : डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज

