गुरुग्राम। घुटनों का दर्द अक्सर उम्र बढऩे की एक सामान्य समस्या मानी जाती है। विशेषज्ञ चिकित्सक अमूमन घुटना रिप्लेसमेंट की सलाह देते हैं और उनके सलाह के अनुसार देश के सभी प्रदेशों में यह प्रक्रिया चलती आ रही है। अनुभवी आर्थोपेडिक सर्जन डा. एनके अग्रवाल ने भी बड़ी संख्या में मरीजों के घुटने के रिप्लेसमेंट किए हैं। लेकिन उनका कहना है कि रिप्लेसमेंट से बेहतर एक और पद्धति सामने आई है। उनका कहना है कि रिप्लेसमेंट के बजाय रीजेनरेशन पद्धति को अपनाया जाए तो रिप्लेसमेंट की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। लुधियाना से ताल्लुक रखने वाले डा. अग्रवाल ने इस पद्धति को लुधियाना प्रोटोकॉल का नाम दिया है। जिसका उद्देश्य है घुटनों की सूजन को नियंत्रित किया जाए, घुटने के अंदर के माहौल को बेहतर बनाया जाए और शरीर की प्राकृतिक हीलिंग क्षमता को और अधिक मजबूत बनाया जाए। इस पद्धति का प्रयोग उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी के उपचार में किया। उसके बाद से अन्य मरीजों को इस पद्धति का लाभ दिया गया है, जो अब स्वस्थ हैं। उनका यह भी कहना है कि कई ऐसे मरीज, जिन्हें पहले नी रिप्लेसमेंट की सलाह दी गई थी, अब बिना सर्जरी के बेहतर स्थिति में हैं। यह उपचार न्यूनतम इनवेसिव है, यानी इसमें बड़े ऑपरेशन की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं होता, एनेस्थीसिया की आवश्यकता नहीं पड़ती और मरीज उसी दिन घर लौट सकता है। इससे इलाज आसान और कम जोखिम वाला बन जाता है। उनका यह भी कहना है कि जिन मामलों में घुटना बहुत अधिक खराब या टेढ़ा हो चुका है, ऐसे मरीजों की सर्जरी जरुरी है। लेकिन शुरुआती और मध्यम अवस्था में अगर समय पर इलाज शुरू किया जाए, तो सर्जरी को टाला जा सकता है। डा. अग्रवाल कहते हैं कि वह आज भी जरूरत पडऩे पर नी रिप्लेसमेंट करते हैं, लेकिन इसे वह पहला नहीं बल्कि आखिरी विकल्प मानते हैं। उन्होंने ऐसे मरीजो से आग्रह किया है कि घुटनों के दर्द को नजरअंदाज न करें और इलाज के लिए केवल सर्जरी पर निर्भर न रहें। अब रीजेनरेशन आधारित इलाज एक मजबूत और उभरता हुआ विकल्प बनकर सामने आ रहा है।
नी रिप्लेसमेंट का विकल्प माना जा रहा है रीजेनरेशन पद्धति को : डा. एनके अग्रवाल

