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चिंता का दीमक इंसान को कर रहा है खोखला : स्वामी दिव्यानंद महाराज

गुरुग्राम। श्री गीता साधना सेवा समिति के संस्थापक अध्यक्ष गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने मानवता के कल्याण के लिए राजधानी दिल्ली स्थित श्री गीता मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में वर्तमान समय में इंसान की मानसिक स्थिति और सच्चे सुख-शांति की परिभाषा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि आज प्रत्येक प्राणी की यही इच्छा है कि उसे जीवन में सुख-शांति की अनुभूति हो और मन को चैन मिले। मनुष्य एक ऐसा सुख चाहता है जो कभी खत्म न हो, और दुखों से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहता है। इसी चाहत में वह तमाम तरह की भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाता है। स्वामी जी ने सचेत करते हुए कहा कि स्मरण रहे, धनवान होने की पहचान केवल बाहर की संपत्ति या सुविधाएं जुटा लेना नहीं है। आज इंसान के भीतर चिंता का ऐसा दीमक लगा हुआ है, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। उन्होंने बताया कि संसार में जो लोग बहुत बड़े या अमीर दिखाई देते हैं, वे भी अक्सर चिंता रूपी रोग से ग्रसित रहते हैं। इस चिंता से मुक्ति का एकमात्र उपाय प्रभु का सिमरन और भजन ही है। स्वामी दिव्यानंद ने गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों को भक्ति का वास्तविक मर्म समझाते हुए कहा कि भजन-भक्ति का अर्थ केवल नाम जाप और ईश्वर का स्मरण करना ही नहीं है। बल्कि प्रभु की व्यवस्था व मर्यादा में रहना और अपने घर-गृहस्थी के कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करना भी भजन ही है। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता है, तो उसके जीवन में हमेशा विक्षेप बने रहेंगे। स्वामी जी का यह दिव्य संदेश आज के तनावपूर्ण जीवन में भटके हुए समाज को सही दिशा दिखाने वाला और मन को असीम शांति प्रदान करने वाला है।