गुरुग्राम। जो व्यक्ति दूसरों की निंदा और चुगली में लिप्त रहता है या उसे सुनता है, वह कभी भी सच्चा भक्त या साधक नहीं बन सकता। उक्त विचार गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने समाज और साधकों के लिए आध्यात्मिक संदेश जारी करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी गंदे कमरे या कीचड़ से भरी नदी में उतरने को तैयार नहीं होता, तो फिर लोग अपनी जुबान और दिमाग में गंदगी लेकर उसी में क्यों जीते रहते हैं? उन्होंने भक्तों को मार्गदर्शन देते हुए कहा कि यदि किसी से कोई भूल या गलती हुई है, तो उसी व्यक्ति को उसकी भूल का अहसास कराना चाहिए ताकि वह स्वयं में सुधार कर सके। दूसरों के सामने उसकी चर्चा करना और दूसरों को बताना केवल अपनी छोटी सोच का परिचय देना है। स्वामी जी ने समाज में फैल रही इस कुरीति पर प्रहार करते हुए कहा कि यह बेहद बुद्धिहीनता की बात है कि गंदगी किसी एक जगह पर है और झाड़ू किसी दूसरे मोहल्ले में लगाया जा रहा है। उन्होंने सभी साधकों और भक्तों को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे लोगों से तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए जो निंदा-चुगली और व्यर्थ की बातों में समय नष्ट करते हैं। यदि ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश न लगाया गया, तो हमारे घरों और मोहल्लों में ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार की दुर्गंध फैलती रहेगी, जिससे शांति और भक्ति का माहौल नष्ट हो जाएगा।
निंदा-चुगली करने और सुनने वाला कभी सच्चा साधक नहीं हो सकता : डॉ. स्वामी दिव्यानंद

