गुडग़ांवI कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को 34 साल पुराने मामले में एक वर्ष की सश्रम कारावास की सजा
सुनाई है, जिस पर सिद्धू ने आत्मसमर्पण भी कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने जहां नवजोत सिंह सिद्धू को सजा सुनाकर सार्थक संदेश तो दिया है, वहीं शीर्ष अदालत ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर बरी कर दिए गए सिद्धू को सजा दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने संदेश दिया है कि अपराध चाहे आम आदमी ने किया हो या किसी खास आदमी ने, वह अपराध की सजा से बच नहीं सकता।
देश का कानून सभी लोगों के लिए बराबर है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिद्धू को दी गई सजा पर साईबर सिटी में शनिवार को पूरे दिन चर्चा होती रही। अधिवक्ताओं कानून की जानकारी रखने वालों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सिद्धू को सजा देकर समाज में सार्थक संदेश दिया है। हालांकि इस मामले में सिद्धू पर एक हजार रुपए का जुर्माना अदालत द्वारा लगा दिया गया था। सभी यह भी मान रहे थे कि सिद्धू को अपने किए की पर्याप्त सजा अदालत ने दे दी है। लेकिन पीडि़त पक्ष ने अदालत के उस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी थी और मांग की थी कि सिद्धू को अधिकतम समाज मिलनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल यह याचिका स्वीकार की, अपितु पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए बरी किए गए सिद्धू को एक साल की सश्रम कारावास की सजा सुना दी है। कानून के जानकारों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अपनी निष्पक्ष भूमिका निभाई है। देशवासियों को सर्वोच्च न्यायालय की न्याय प्रणाली पर गौरव होना चाहिए कि न्यायालय ने छोटे-बड़े का ध्यान न रखते हुए कानून के हिसाब से सजा दी है। भादंस की धारा 323 के तहत दी जाने वाली अधिकतम समाज एक वर्ष ही है। इन जानकारों का यह भी कहना है कि यदि अपराध के अनुरुप अपराधी को पर्याप्त सजा न दी जाए तो समाज में कानून का भय खत्म हो जाएगा। देशवासियों को अपने देश की न्याय प्रणाली का सम्मान करते हुए खुद को गौरान्वित महसूस करना चाहिए।

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