गुडग़ांव: देशवासी आजादी का 75वां अमृत महोत्सव मना रहे हैं, जिसमें देश की स्वतंत्रता में अपना सर्वोच्च बलिदान करने वाले शहीदों, क्रांतिकारियों व स्वतंत्रता सेनानियों को देश याद भी कर रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में असंख्य लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। उन्हीं के कारण आज देशवासी खुली हवा में सांस ले रहे हैं। रानी लक्ष्मीबाई का स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा योगदान रहा था। उन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
उनकी जयंती पर वार्ड 16 के समाजसेवी विशाल कटारिया ने उन्हें याद करते हुए कहा कि रानी लक्ष्मी बाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनके पिता मोरोपंत तांबे मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी। उनको बचपन में छबीली के नाम से भी बुलाया जाता था। उन्होंने बचपन में ही शिक्षा के साथ-साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली। वर्ष 1842 में उनका विवाह झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया था। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सितम्बर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, परंतु 4 माह की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गई थी।
वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर उन्होंने दत्तक पुत्र लेने की सलाह लक्ष्मीबाई को दी थी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया था। तत्कालीन अंग्रेजी शासन ने दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी नहीं माना। अंगे्रजों ने उनके राज्य का सभी खजाना भी जब्त कर लिया। रानी लक्ष्मी बाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने झांसी राज्य की रक्षा करने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहां जबरदस्त हिंसा भी हुई थी। लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की सेना का गठन कर उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण भी दिया था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंगे्रजी शासन की आंखों का कांटा बनी हुई थी।
उन्होंने झांसी पर आक्रमण कर झांसी शहर पर कब्जा कर लिया, लेकिन लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के साथ अंग्रेजों से बचकर कालपी पहुंची और वहां तात्या टोपे से मिली। तात्या टोपे की सहायता से उन्होंने ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास अंग्रेजी सेना से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गई थी। कटारिया ने कहा कि महारानी लक्ष्मीबाई ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाकर देश को आजाद कराने में अपना पूरा योगदान दिया। उनके दिखाए आदर्शों पर चलकर ही देश व समाज का भला संभव है, यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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