गुरुग्राम। ईश्वर से यदि मानव जीवन मिला है, तो इसका भरपूर आनंद उठाना चाहिए। स्वयं को और अपने धन को सत्कर्म में लगाएं। दिन-रात केवल धन-धन करते रहने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि एक दिन हमारा निधन हो जाएगा और यह सारा धन यहीं धरा का धरा रह जाएगा। उक्त विचार गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने एक कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्होंने मानव जीवन को सार्थक बनाने और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण सूत्र दिए। स्वामी जी ने कहा कि जब फटे हुए दूध से भी माताएं पनीर बना लेती हैं, तो क्या हमारे टूटे-फूटे रिश्ते पुन: नहीं जुड़ सकते? बिल्कुल जुड़ सकते हैं, बशर्ते हमारी सोच सकारात्मक हो। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे केवल शिकायतें करते-करते अपनी जिंदगी न गुजारें। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सचमुच खुश रहना है, तो किसी की भी कड़वी या बुरी बात को गंभीरता से दिल पर न लें। हो सकता है कि सामने वाले का स्वभाव ही वैसा हो। यदि आप हर छोटी-बड़ी बात को गंभीरता से लेंगे, तो जीवन एक बेजान पत्थर की मूर्ति जैसा बन जाएगा। महाराज जी ने मनुष्यों की तुलना पारस पत्थर से करते हुए कहा कि तुम तो पारस हो, जिसके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है। फिर गलत कोई और कहे, गलत कोई और करे, और उसके कारण दुखी हम स्वयं हों—यह भला जीवन जीने की कैसी कला है? जीवन को हंसी-खुशी से जीने का एक ढंग यह भी है कि मूर्खों की बेकार की बातों को हंसी में उड़ा देना चाहिए।
जीवन का आनंद लें और धन को सत्कर्म में लगाएं : डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज

