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मनुष्य का आंतरिक आचरण शुद्ध नहीं होगा तो भक्ति का वास्तविक फल नहीं हो सकता प्राप्त : स्वामी दिव्यानंद महाराज

गुरुग्राम। आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक शांति के प्रसार के लिए नाम अभ्यास शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं को दिव्य संकल्प की प्रेरणा देने के लिए गीताज्ञानेश्वर डॉ. स्वामी दिव्यांन्द महाराज भिक्षु विशेष रूप से उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में पहुंचे साधकों ने स्वामी जी के ओजस्वी एवं प्रेरणादायक प्रवचनों का श्रवण कर आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। महाराज जी ने भक्ति, नाम जाप और साधना के गूढ़ नियमों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक मनुष्य का आंतरिक आचरण शुद्ध नहीं होता, तब तक भक्ति का वास्तविक फल प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि वैष्णव संतों का स्पष्ट अनुभव रहा है कि नाम जाप करने वाले साधक को समाज में रहकर भी व्यर्थ की बातचीत, निरर्थक चर्चाओं और दूसरों की निंदा-चुगली से दूर रहना चाहिए। यदि जीवन में लोभ, द्वेष, ईष्र्या और निंदा बनी रहेगी, तो मन की शुद्धि संभव नहीं है। मन और बुद्धि के सात्विक हुए बिना नाम जाप की सिद्धि कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन में नाम रूपी अमूल्य रत्न को धारण करने के लिए मन रूपी बर्तन का स्वच्छ होना अनिवार्य है। उन्होंने सहज उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि किसी को बर्तन में पवित्र गंगाजल लेना हो, तो वह केवल जल की पवित्रता ही नहीं देखता, बल्कि पहले अपने बर्तन की स्वच्छता सुनिश्चित करता है। यदि बर्तन गंदा होगा, तो गंगाजल भी दूषित हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार, ईश्वर के नाम को हृदय में बसाने से पहले अपने मन के मैल को धोना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि साधना के दौरान मन के भटकने की समस्या पर मार्गदर्शन करते हुए गुरुदेव ने कहा कि शुरुआती दौर में मन का विचलित होना स्वाभाविक है, क्योंकि मनुष्य पर सांसारिक संस्कारों का प्रभाव बहुत गहरा होता है। परंतु मन के भटकाव से घबराकर नाम जाप छोड़ देना इसका समाधान नहीं है। यदि मन भटके, तब भी स्मरण का प्रयास जारी रखना चाहिए। इस भटकाव और सांसारिक बंधनों से मुक्ति का एकमात्र उपाय नाम जाप के अभ्यास को और अधिक बढ़ाना है। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी साधकों ने पूज्य गुरुदेव के बताए मार्ग पर चलने, नाम जाप का निरंतर अभ्यास करने और अपने जीवन को निष्काम व सात्विक बनाने का दिव्य संकल्प लिया।