गुरुग्राम। शारदीय नवरात्रि के अवसर पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिनमें प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ उठा रहे हैं। गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने नवरात्र और व्रत-उपासना के असली अर्थ को समझाते हुए समाज को भौतिकता और दिखावे से ऊपर उठकर आत्म-संयम अपनाने का आह्वान किया है। स्वामी जी ने संदेश में कहा कि नवरात्र केवल परंपरा का निर्वाह करने या उपवास के नाम पर व्रत का उपहास उड़ाने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक उच्च कोटि की साधना है। जिस प्रकार जंगल में लगी भीषण आग के बीच स्वयं को सुरक्षित बचा लेना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है, वैसे ही आज के दौर में धधक रही विलासिता और भोगवाद की आग से खुद को बचाए रखना साधक भक्तों के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में भजन और उपासना में लीन रहकर मन को शांत और वाणी को मधुर बनाए रखना ही सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि केवल दिखावे के लिए पूजा-पाठ करना ही अध्यात्म का उद्देश्य नहीं है। असली अध्यात्म तो वह है जहाँ मनुष्य का मन शांत और प्रसन्न हो तथा जीवन पूरी तरह कर्तव्यनिष्ठ हो। यदि ऐसा नहीं है, तो हम धर्म और उपासना के नाम पर केवल समाज को और खुद को धोखा दे रहे हैं। स्वामी दिव्यानंद ने स्पष्ट किया कि आज अध्यात्म के नाम पर जैसा रूप देखने को मिल रहा है, वास्तविकता उससे भिन्न है। यदि कोई व्यक्ति भोगवाद और विलासिता का जीवन जीते हुए राग-द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार और चिड़चिड़ेपन की आग में ही जल रहा है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि उसने अभी प्रभु नाम के सरोवर में गोता नहीं लगाया है, बल्कि उसने केवल व्रत, पूजा और भजन के नाम पर समाज में शोर मचा रखा है।
शांत मन और कर्तव्यनिष्ठ जीवन ही अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य : स्वामी दिव्यानंद महाराज

