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 करोड़ों का बैंक बैलेंस, फिर भी कंजूसी की कैद में बुढ़ापा

गुरुग्राम।जीवन में बड़ी विडंबना है कि पूरी जिंदगी हम उस समय का इंतजार करते हैं जब हम निश्चिंत होकर अपनी कमाई का आनंद ले सकें। लेकिन जब वह समय यानी रिटायरमेंट आता है, तो अधिकांश लोग एक अजीब सी मानसिक कैद में जकड़ जाते हैं। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद भी 65-70 साल के बुजुर्ग एक ऐसे डर में जी रहे हैं कि कहीं पैसा खत्म न हो जाए। क्या यह वाकई बचत है या जीवन की खुशियों का समझौता?
क्यों बनी है यह मानसिक स्थिति?
चिकित्सा विशेषज्ञ डा. मनोज शर्मा का कहना है कि जिन लोगों ने 35-40 साल का लंबा समय अभाव और संघर्ष में बिताया है, उनका दिमाग सर्वाइवल मोड में सेट हो जाता है। उनके लिए पैसा केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि सुरक्षा का एकमात्र कवच बन जाता है। इस कारण, रिटायरमेंट के बाद भी वे उसी कमी वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते।
बचत की अति, बनी बीमारी की जड़
उनका कहना है कि रिटायरमेंट के बाद बुजुर्गों के जीवन में कुछ प्रमुख समस्याएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। जैसे कि करोड़ों की एफडी बैंक में होते हुए भी मूल धन को न छूना एक ऐसी विडंबना है जिससे महंगाई का असर उनके जीवन स्तर पर पड़ता है। इतना पैसा खर्च क्यों करें, यह सोचकर घुटने के ऑपरेशन, मोतियाबिंद या दांतों के इलाज को टालना सबसे बड़ी भूल साबित होती है। छोटी बीमारी समय पर इलाज न होने के कारण बाद में गंभीर और अधिक खर्चीली बन जाती है। भीषण गर्मी में एसी न चलाना, स्लीपर क्लास में थका देने वाली यात्रा करना या मनपसंद भोजन से परहेज करना—यह समझदारी नहीं, बल्कि खुद को दी जाने वाली मानसिक और शारीरिक सजा है।
विरासत या खुशहाली का बोझ?
उनका कहना है कि आज की युवा पीढ़ी के पास संसाधनों और आय के अपने साधन हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे माता-पिता से पैसा नहीं, बल्कि उनके चेहरे पर सुकून और स्वास्थ्य देखना चाहते हैं। जब माता-पिता कंजूसी में खुद को कष्ट देते हैं, तो वह बच्चों के लिए भी चिंता और ग्लानि का कारण बनता है।
स्वर्ण युग को खुशहाल बनाने का रोडमैप
डा. शर्मा का कहना है कि रिटायरमेंट का अर्थ केवल काम छोडऩा नहीं, बल्कि जीवन को पुन: खोजना है। इसके लिए विशेषज्ञों ने कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए हैं कि अपने पैसे को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटें। एक सर्वाइवल फंड जो केवल आपातकालीन स्वास्थ्य और जरूरी खर्चों के लिए हो और दूसरा लाइफस्टाइल फंड जिसे खर्च करने में आपको कोई अपराधबोध न हो। अच्छा भोजन, आरामदायक बिस्तर और समय पर इलाज खर्च नहीं, बल्कि आपके जीवन के वर्षों को जोडऩे का निवेश है। हर महीने एक राशि ऐसी रखें जो सिर्फ आपकी खुशी के लिए हो—चाहे वह यात्रा हो, कोई शौक हो या परिवार के साथ बाहर जाना। याद रखें, आपके बच्चों के लिए सबसे बड़ा उपहार आपकी खुशहाली और आत्मनिर्भरता है। एक उदास, बीमार और कंजूस माता-पिता की तुलना में एक खुश और सक्रिय माता-पिता होना बच्चों के लिए गर्व की बात है।
जीने का है यही समय  
उनका कहना है कि जीवन की अंतिम शाम केवल पछतावे के लिए नहीं होती। यदि आपने ईमानदारी से मेहनत की है, तो उस फल का स्वाद लेने का अधिकार भी आपका है। एसी चलाएं, अच्छी यात्राएं करें, उन शौक को पूरा करें जिन्हें आपने बचपन में अधूरा छोड़ दिया था। याद रखिए, अंत में बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि आपकी यादें और आपके द्वारा जी गई खुशियां ही आपके साथ रहेंगी। *पैसे को बचाना अच्छी आदत है, लेकिन पैसे की वजह से जिंदगी को खो देना एक बड़ी भूल है।