गुडग़ांव, भगवान श्री परशुराम महर्षि थे। उन्हें
अजर-अमर रहने का वरदान प्राप्त था। उनका जन्म महर्षि जमदग्रि की पत्नी
रेणुका के गर्भ से उस समय हुआ था, जब मानव जाति राक्षसों के अत्याचारों
से त्रस्त थी। यह कहना है सामाजिक संस्था वल्र्ड ब्राह्मण फेडरेशन
सन्मार्ग के चेयरमैन पंडित मांगेराम शर्मा का। उनका कहना है कि भगवान
परशुराम ने आर्य संस्कृति को ध्वस्त करने वालों को चुनौती दी थी और वह
अपनी आर्यनिष्ठता, तेजस्विता, संगठन, क्षमता, साहस और शौर्य के बल पर
विजयी भी हुए। भगवान परशुराम एक ऐसी शौर्यगाथा हैं जो किसी भी युग में
अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती है। परशुराम ऋषि के
रक्षक और अजेय सहस्त्रार्जुन के काल बने। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख भी
है कि उन्होंने पृथ्वी को 21 बार राक्षसी वृति के राजाओं से विहीन किया
था और समस्त वसुंधरा को यज्ञ के समय दान में दे दिया था। धर्म की रक्षा
के प्रेरणास्त्रोत भगवान परशुराम की आज जयंती है, जिसे भारत देश में ही
नहीं, अपितु विश्व के अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन
कोरोना वायरस के चलते जयंती को सार्वजनिक रुप से नहीं मनाया जा सकेगा।
इसलिए सभी लोग उनकी जयंती को अपने घरों में धार्मिक अनुष्ठान के साथ
मनाएं। उनका कहना है कि आज श्री परशुराम जयंती के अवसर पर अक्षय तृतीया
भी पड़ रही है। इसलिए सायं को 7 बजे सभी घी के दीपक जलाकर जनकल्याण हेतू
कोरोना की महामारी से निजात पाने व विश्व की सुख-समृद्धि के लिए भगवान
श्री परशुराम से कामना करें।

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