गुडग़ांवI हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का विशेष महत्व है। वीरवार को भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सुहागिन महिलाओं और युवतियों ने व्रत रखकर सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना की और उनसे मनवांछित फल की कामना भी की। व्रती महिलाओं ने प्रात: स्नानादि से निवृत होने के बाद सभी देवी-देवताओं का गंगाजल से अभिषेक कर सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने सप्तऋषियों से मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुई अपनी गलतियों के लिए भी क्षमा याचना की और अन्य महिलाओं को इससे संबंधित जानकारी भी देने का संकल्प लिया।
परिवार की वृद्ध महिलाओं से व्रत कथा भी महिलाओं ने सुनी। किवदंती है कि विदर्भ देश में एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी। उसने अपनी पुत्री का सुयोग्य वर से विवाह कर दिया था, लेकिन कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दंपत्ति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे। कहा जाता है कि कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। उसने सारी बात माता से कही। माता ने ब्राह्मण को पूरी घटना की जानकारी दी। कहा जाता है कि ब्राह्मण ने समाधि द्वारा इन घटना का पता लगाया कि पूर्व जन्म में यह कन्या ब्राह्मणी थी, इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे और इस जन्म में भी इसने ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। लडक़ी ने विधिविधान से व्रत रखा और तभी से ऋषि पंचमी पर व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने का प्रचलन चला आ रहा है।

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