गुडग़ांव- देश की आजादी में क्रांतिकारियों व स्वतंत्रता सेनानियों का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजी शासन का विरोध करने वाले क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में फांसी पर लटका दिया था। इन्हीं क्रांतिकारियों में से एक सोहनलाल पाठक भी थे। जिन्हें अंग्रेजों
ने बर्मा की मांडले जेल में फांसी की सजा दी थी। उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 7 जनवरी 1873 को अमृतसरजिले के पट्टी गांव में पंडित जिंदा राम के घर में हुआ था। मिडिल पास कर वह शिक्षक बन गए थे। इसी दौरान उनका संपर्क क्रांतिकारी लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय से हुआ। उन्हीं प्रेरणा से वह निष्ठावान क्रांतिकारी बन गए। क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर व नलिनी घोष से भी वह बड़े प्रभावित थे। क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने देश को आजाद कराने में अंग्रेजों के खिलाफ कई घटनाओं को अंजाम दिया था। वह अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बन गए थे।
वक्ताओं ने कहा कि शासन विरोधी साहित्य का प्रकाशन करने व विद्रोह भडक़ाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। इस प्रकाशित साहित्य से वह देश के युवाओं को देश की आजादी की लड़ाई के लिए जागरुक करते रहे थे और उनके इन लेखों का युवाओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा था तथा वे देश की आजादी में कूद पड़े थे। अंग्रेजी सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया और मांडले जेल में 10 फरवरी 1916 को उन्हें फांसी दे दी गई थी। हालांकि अंग्रेजों ने उनसे कहा था कि अगर वे क्षमा मांग लें तो उनकी फांसी रद्द की जा सकती है, लेकिन पाठक जी ने ऐसा नहीं किया। उनका कहना था कि अपराधी अंग्रेज हैं, उन्हें माफी मांगनी चाहिए। देश हमारा है और हम उसे आजाद कराना चाहते हैं। बताया जाता है कि फांसी के समय पाठक जी ने जल्लाद के हाथों से फांसी का फंदा छीनकर स्वयं अपने गले में डाल दिया था। वक्ताओं ने देशवासियों से आग्रह किया है कि देश को आजाद कराने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले शहीदों व उनके परिवारों का सदैव सम्मान किया जाना चाहिए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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