गुडग़ांव। भारतीय संस्कृति को अपनी कला के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई कलाकारों का योगदान रहा है। भारतीय नृत्य कला को लोकप्रिय बनाने के लिए कई कलाकारों ने बड़ा परिश्रम किया है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। भरतनाट्यम नृत्य की रुकमणि देवी बड़ी प्रसिद्ध नृत्यांगना थी। उन्होंने भरतनाट्यम नृत्य में भक्तिभाव को भरा तथा नृत्य की अपनी एक परंपरा आरम्भ की। नृत्यांगना की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए प्रसिद्ध रंगकर्मी व हरियाणा कला परिषद के निदेशक संजय भसीन ने कहा कि उनका जन्म 29 फरवरी 1904 को तमिलनाडु के मदुरै जि़ले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच पली-बढ़ी रुक्मिणी देवी ने महान संगीतकारों से भारतीय संगीत की शिक्षा ली। रुक्मिणी के पिता संस्कृत के विद्वान् थे। लड़कियों को मंच पर नृत्य करने की इजाजत नहीं थीं। ऐसे में नृत्य सीखने के साथ-साथ रुक्मिणी देवी ने तमाम विरोधों के बावजूद अपनी प्रस्तुति दी थी। उन्होंने नृत्य की कई कई विधाओं को खुद बनाया भी और उन्हें अपने भाव में विकसित किया।
उन्होंने कहा कि रुक्मिणी देवी ने जॉर्ज अरुंडेल से विवाह किया था। जानवरों के प्रति भी उनका असीम प्यार था। राज्यसभा सांसद बनकर उन्होंने पशु क्रूरता निवारण के लिए विधेयक का प्रस्ताव भी रखा था। वह एनीमल वेलफेयर बोर्ड की चेयरमैन भी रही थी। कला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था और संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप भी उन्हें मिली थी। बताया जाता है कि वर्ष 1977 में पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने रुक्मिणी देवी को राष्ट्रपति के पद की पेशकश की थी, पर उन्होंने राष्ट्रपति भवन से ज्यादा महत्त्व अपनी कला अकादमी को दिया तथा उनकी पेशकश को स्वीकार नहीं किया था। उनका निधन 24 फऱवरी 1986 को चेन्नई में हुआ था। प्रो. भसीन ने संगीत व कला के क्षेत्र में प्रयासरत कलाकारों से आग्रह किया है कि वे प्रसिद्ध नृत्यांगना के जीवन से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें, उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी।


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