गुडग़ांवI देशवासी आजादी का 75वां अमृत महोत्सव मना रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम में सर्वोच्च बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों, शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों को देशवासी याद भी कर रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान भी बड़ा महत्वपूर्ण रहा था। महिलाओं ने
स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढक़र भाग लिया था। स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली की जयंती पर वक्ताओं ने उन्हें याद करते हुए कहा कि1942 में भारत छोडो आंदोलन के दौरान मुंबई के गोवालीया मैदान में अरुणा आसफ अली को कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए याद किया जाता है। उनका जन्म बंगाली ब्राह्मण परिवार में 16 जुलाई 1909 को हरियाणा के कालका में हुआ था। उन्होंने स्कूली शिक्षा नैनीताल में प्राप्त की थी।
वह बहुत ही कुशाग्र बुद्धि और पढ़ाई लिखाई में बहुत चतुर थीं। पढ़ाई के बाद वह शिक्षिका बन गई और कोलकाता के गोखले मेमोरियल कॉलेज में अध्यापन कार्य करने लगीं। उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए कई बार जेल यात्राएं भी की थी। वक्ताओं का कहना है कि उनके ऊपर जयप्रकाश नारायण, डा. राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादियों के विचारों का अधिक प्रभाव पड़ा। 1942 से 1946 तक वह स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रही थी। हालांकि अंग्रेजों ने उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली थी, लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया था।
उन्होंने मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए मजदूर आंदोलन भी छेड़ा था। वह दिल्ली नगर निगम की प्रथम महापौर चुनी गई थी। शांति एवं सौहार्द के क्षेत्र में उन्होंने बड़ा कार्य किया था। 29 जुलाई 1996 को उनका निधन हो गया था। केंद्र सरकार द्वारा उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं को अरुणा आसफ अली के आदर्शों से शिक्षा लेनी चाहिए, ताकि देश व समाज तरक्की कर सके।

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