गुडग़ांव, कोरोना महामारी ने पिछले डेढ वर्ष से समाज के
हर वर्ग को प्रभावित कर रख दिया है। पिछले डेढ़ वर्ष से घरों में रहने के
कारण बच्चे भी चिड़चिड़े हो गए हैं। यानि कि कोरोना ने बच्चों के दिमाग
पर भी बुरा असर डालकर उनको प्रभावित कर रख दिया है। कोरोना महामारी के
कारण स्कूल डेढ़ वर्ष से बंद हैं। बच्चे घरों में रहकर ही ऑनलाईन क्लासेज
कर रहे हैं। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि बच्चों के स्कूल कब खुलेंगे।
क्योंकि कोरोना महामारी की संभावित तीसरी लहर के आने की बात भी कही जा
रही है और इस लहर को बच्चों के लिए ज्यादा हानिकारक बताया जा रहा है।
बच्चों के घरों में रहने से जहां उनकी शारीरिक गतिविधियां थम सी गई हैं,
वहीं उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता दिखाई देने लगा है।
बच्चों के व्यवहार में काफी समय से परिवर्तन भी अभिभावक देख रहे हैं। ऐसे
बच्चों का अभिभावक ऑनलाईन ही उपचार चिकित्सकों से करा रहे थे लेकिन अधिक
समस्या आने पर अब वे बच्चों को लेकर अस्पताल आदि में भी जा रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि ऐसे बच्चों की जांच करने के बाद पता चला है कि वे
मानसिक रुप से स्वस्थ नहीं हैं। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों में काफी
समय से बदलाव देखा जा रहा है, उन्हें बात-बात पर जहां गुस्सा आने लगता है
वहीं वे पढ़ाई के समय में भी अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं।
उनको लगातार सिरदर्द, कम नींद आने व नेत्रों संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो
रही हैं। कई बच्चों को तो सिरदर्द होने के कारण आंखों की जांच कराकर
उन्हें चश्मा तक भी लगाना पड़ गया है, ताकि सिरदर्द से निजात मिल सके और
उनकी नेत्र दृष्टि जहां है, वहीं टिकी रहे। अभिभावकों का कहना है कि
ऑनलाईन क्लासेज के लिए बच्चों को लैपटॉप व मोबाईल पर अधिक समय देना पड़
रहा है, जिससे उन्हें इस प्रकार की परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा
है। चिकित्सकों का कहना है कि शारीरिक गतिविधियां कम होने से बच्चों के
स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ा है। इस कारण से उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता
भी कम हुई है। चिकित्सकों का यह भी कहना है कि इस समय यह जरुरी है कि
माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय दें। प्रतिदिन उनके साथ कम से कम
2 घंटे अवश्य बिताएं और उनसे नियमित रुप से बातचीत भी करते रहें तो यह
बच्चों के लिए भी लाभदायक होगा। उनका कहना है कि बच्चों को मोबाईल फोन व
लैपटॉप सीमित समय के लिए ही दें, ताकि उन्हें नेत्र संबंधी बीमारियों से
बचाया जा सके। घरों में ही उनके लिए खेलने-कूदने व हल्के-फुल्के व्यायाम
की भी व्यवस्था अवश्य करें।

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