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कर्मकांड और दिखावे से परे है सच्ची भक्ति, ब्रह्म विद्या के प्रतीक हैं श्री गणेश : डॉ. स्वामी दिव्यानंद महाराज

गुरुग्राम। केवल कुछ विधानपूर्वक कर्मकांड कर लेना या इष्ट मूर्ति के समक्ष यंत्रवत धूप-बत्ती आदि जला देना ही सच्ची उपासना या भक्ति नहीं है। इसी प्रकार, व्रत और उपवास का अर्थ केवल भूखे रहना या सामान्य भोजन की जगह अलग से विशेष व्यंजन खा लेना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल पेट को आराम देना भर नहीं है, बल्कि परमात्मा से जुडक़र अपने मन को भी आंतरिक विश्राम देना है। उक्त विचार गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज भिक्षु ने वर्तमान समय में धर्म के नाम पर बढ़ रहे दिखावे, कर्मकांड और पाखंड पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज श्री गणपति महोत्सव को केवल झांकियां बनाकर एक दूसरे से प्रतियोगिता करने का माध्यम बना दिया गया है। विसर्जन के नाम पर देव मूर्तियों को कचरे के ढेर में तब्दील कर देना वास्तव में हमारे पवित्र उत्सवों को विकृत करना है। उन्होंने दु:ख जताया कि तथाकथित धार्मिक हिन्दू कहलाने वाले लोग ही जाने-अनजाने अपने धर्म गुरुओं और देवी-देवताओं का अपमान कर रहे हैं। महाराज जी का कहना है कि आज हमारे मूल ग्रंथों का पठन-पाठन लगभग नाम मात्र का रह गया है। इसके विपरीत, इन सद्ग्रंथों और धर्म की आड़ में चमत्कारों तथा टोने-टोटकों की दुकानें तेजी से खुलती जा रही हैं। समाज में धर्म के नाम पर ब्रह्म जिज्ञासा बहुत कम हो गई है, जबकि भय, भ्रम और कामना पूर्ति का भाव लगातार बढ़ता जा रहा है। डॉ. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने बताया कि भगवान श्री गणेश वस्तुत: ब्रह्म विद्या प्रदान करने वाले देव हैं, और इसी दिव्य ज्ञान के कारण वे सभी देवताओं में अग्र पूज्य हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे बाहरी दिखावे और भ्रम को छोडक़र सच्चे मार्ग पर चलें।