गुडग़ांव, देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने
वर्ष 1975 की 25 जून की मध्य रात्रि में देश में आपातकाल की घोषणा कर दी
थी। विपक्ष के बड़े नेताओं संपूर्ण क्रांति का आह्वान करने वाले जयप्रकाश
नारायण (जेपी), मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटलबिहारी वाजपेयी,
लालकृष्ण अडवानी, राजनारायण, मधुलिमे, चौधरी देवीलाल सहित करीब 2 लाख
नेताओं और कार्यकर्ताओं को बिना कारण बताए जीआईआर और मीशा जैसे काले
कानूनों में गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था। कुलदीप नैय्यर सहित
करीब 200 पत्रकार भी गिरफ्तार किए गए थे। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगा
दी गई थी। यानि कि बिना अनुमति के कोई समाचार प्रकाशित नहीं हो सकता था।
करीब 2 साल तक इन नेताओं को जेलों में रहना पड़ा था। हालांकि आपातकाल को
बीते एक जमाना गुजर चुका है, लेकिन आज भी आपातकाल को याद कर आपातकाल के
पीडि़त लोग आज भी सिहर जाते हैं। जानकारों का कहना है कि आपातकाल सभी
राजनैतिक दलों के लिए एक सबक है। पारिवारिक राज कायम करने हेतू कोई दल या
नेता भविष्य में प्रयासरत न हो। इसके लिए राजनैतिक दलों में आंतरिक
लोकतंत्र कायम रहना चाहिए। किसी व्यक्ति एवं दल की सीमा से देश का स्थान
सदैव ऊंचा रहना चाहिए। हालांकि इंदिरा गांधी को आपातकाल का दंश कई वर्ष
झेलना भी पड़ा था। गुडग़ांव से भी बड़ी संख्या में आपातकाल का विरोध कर
रहे सामाजिक व धार्मिक कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया था।
केंद्र व प्रदेश में भाजपा सरकार के बनने से आपातकाल के पीडि़तों को
लोकतंत्र सेनानी का सम्मान देते हुए उनकी पैंशन भी लागू की हुई है।
जानकारों का कहना है कि देश में आपातकाल लगाने की कोई भी राजनैतिक दल
जल्दी से कोई निर्णय नहीं लेगा। गुडग़ांव के व्यवसायी श्रीचंद गुप्ता,
महावीर भारद्वाज, विपिन सिंघल, प्रमोद वशिष्ठ, अनिल नागपाल, आत्मप्रकाश
मनचंदा, प्रेमप्रकाश गिरधर, सोहनलाल गोगिया, राजवीर सिंह, कमला सिंगला,
डा. रमेश कुमार अग्रवाल, ठाकुर धर्मसिंह, दलीप सिंह आदि को आपातकाल के
दौरान जेलों में बंद कर दिया था। लोकतंत्र सेनानी संगठन के प्रदेश
महासचिव महावीर भारद्वाज का कहना है कि आपातकाल में पुलिस जिसे चाहे बिना
कारण बताए गिरफ्तार कर सकती थी। अदालतें भी अपनी आजादी खो चुकी थी। प्रैस
की आजादी पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई थी। बताया जाता है कि आपातकाल
पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी घोषणा के बाद ही कराए गए थे। तत्कालीन
राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल के मसौदे पर हस्ताक्षर करने के
लिए विवश किया गया था। आखिरकार 21 मार्च 1977 को आपातकाल की समाप्ति हुई।
देश में आम चुनाव कराए गए, जिसमें इंदिरा गांधी की बुरी तरह से हार हुई
तथा देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। देश की आजादी की दूसरी लड़ाई
में जिन लोगों ने अपना बलिदान दिया या जेल यातनाएं सहीं ऐसे
राष्ट्रभक्तों को सभी प्रदेशों में लोकतंत्र सैनानी का नाम दिया गया है।

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