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13 को धूमधाम से मनाया जाएगा लोहड़ी का पर्व

गुरुग्राम। देश के कई राज्यों हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व जम्मू-कश्मीर में लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब व हरियाणा में इस त्यौहार को लेकर अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। नई फसलों से जोड़ कर भी इस पर्व को देखा जाता है। इस बार लोहड़ी का पर्व 13 जनवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार 13 जनवरी को सायं 3 बजकर 18 मिनट तक भद्रा रहेगा। लोहड़ी के दिन प्रदोष काल में अग्नि प्रज्वलित करना सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन सूर्यास्त का समय शाम को 5 बजकर 44 मिनट का रहेगा। ऐसे में सूर्यास्त से 2 घंटे की अवधि लोहड़ी और अग्नि के पूजन के लिए सबसे शुभ रहेगा।
लोहडी का है यह अर्थ
लोहडी का अर्थ है- ल (लकड़ी), ओह (गोहा यानी सूखे उपले), ड़ी (रेवड़ी)। लोहड़ी के पावन अवसर पर लोग मूंगफली, तिल व रेवड़ी को इक_ा कर प्रसाद के रूप में इसे तैयार करते हैं और आग में अर्पित करने के बाद आपस मे बांट लेते हैं। जिस घर में नई शादी हुई हो या फिर बच्चे का जन्म हुआ हो वहां यह पर्व काफी उत्साह व नाच-गाने के साथ मनाया जाता है।
लोग करते हैं लोहड़ी की पूजा
लोहडी पर्व की रात को परिवार व आस-पड़ोस के लोग इक_े होकर लकड़ी जलाते हैं। इसके बाद तिल, रेवड़ी, मूंगफली, मक्का व गुड़ अन्य चीजेेंं अग्नि को समर्पित करते हैं। परिवार के लोग आग की परिक्रमा कर सुख-शांति की कामना करते हैं। अग्नि परिक्रमा की पूजा के बाद रेवड़ी व मूंगफली को प्रसाद के रुप में सभी लोगों को वितरित किया जाता है।
दुल्ला भट्टी को करते हैं याद
लोकगीत गाकर लोग दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। लोहड़ी का गीत सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले दी धी बयाही हो गाया जाता है। बड़े बुजुर्गों का कहना है कि इस लोकगीत से एक पुरातन कहानी भी जुड़ी हुई है। दुल्ला भट्टी नाम के एक डाकू ने पुण्य का काम किया था। ऐसा कहा जाता है कि सुंदर व मुंदर नाम की 2 लड़कियां थी और वह अनाथ थीं। इन लड़कियों के चाचा ने दोनों को किसी सूबेदार को सौंप दिया था। जब डाकू दुल्ला भट्टी को इस बात का पता चला तो उसने सुंंदर व मुंदर दोनों लड़कियों को मुक्त करवाया और 2 अच्छे लडके ढूंढकर इनकी शादी करवा दी। कहा जाता है कि जब इन दोनों लड़कियोंं की शादी हुई थी तो आसपास से लकडियां एकत्रित कर आग जलाई गई थी और शादी में मीठे फल की जगह गुड़, रेवड़ी व मक्के जैसी चीजों का इस्तेमाल किया था। उसी समय से दुल्ला भट्टी की अच्छाई को याद करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।  इस पर्व को लेकर शहर के मुख्य सदर बाजार, जैकबपुरा, सोहना चौक, रामलीला मैदान, ओल्ड व न्यू रेलवे रोड स्थित बाजारों की दुकानों पर मूंगफली, रेवड़ी आदि खरीदने वालों की भारी भीड़ दिखाई दी।