गुरुग्राम। ईश्वर का ही संग आत्मा का उत्थान करता है। भौतिक दुनिया में जो भी संग है वह केवल प्रकृति का संग है। प्रकृति का संग ही धीरे-धीरे आत्मा में 5 विकारों को उत्पन्न करता है। यही कारण है कि स्वर्ग भी परिवर्तित होकर एक दिन घोर नरक का रूप धारण कर लेता है। उक्त विचार धार्मिक संस्था ब्रह्माकुमारीज के बीके मदनमोहन ने व्यक्त किए। उनका कहना है कि मन से ईश्वर के सर्वोच्च संग का नाम ही योग है। भगवान ने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया लेकिन मानव अपने कर्मों से आज दु:खी और अशांत बन गया। छवि का अर्थ यहां आत्मिक गुणों से है। मूल रूप से आत्मा और परमात्मा का स्वरूप समान है। उनके गुण भी समान हैं। अंतर यही है कि मनुष्य आत्मा जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में आती है। जबकि परमात्मा इस चक्र से परे है। इसलिए वो प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहता है। जिस कारण वो सर्व शक्तिमान है। मनुष्य आत्माएं पांच तत्त्वों के भौतिक शरीर में आने के कारण अपने मूल स्वरूप से दूर हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति के गुणों से प्रभावित हो जाती हैं। ऐसे नहीं कि आत्माएं शरीर में आने से अचानक ही भौतिक दुनिया के प्रभाव में आकर अपने अस्तित्व को खो देती है। बल्कि एक लंबे समय तक आत्माएं अपनी मूल ऊर्जा के अस्तित्व में रहती हैं। उन्होंने कहा कि जहां वो सम्पूर्ण सुख, शांति और आनंद का अनुभव करती हैं। उस कालखंड को ही हम स्वर्ग, बहिश्त, जन्नत, वैकुंठ आदि आदि नाम देते हैं। लेकिन जैसे ही आत्मा में प्रकृति का प्रभाव गहरा होने लगता है तो वो अशांति और दु:ख का अनुभव करने लगती है। और ये वही समय होता है जब मनुष्य आत्माएं परमात्मा को याद करने लगती हैं। लेकिन आज हम देखते हैं कि ईश्वर की भक्ति तो ज्यादातर लोग कर ही रहे हैं। लेकिन फिर भी जीवन में सुख, शांति और आनंद का अनुभव नहीं हो रहा है। केवल बाहरी रूप से पूजन और गायन करने से फर्क नहीं पड़ेगा। उसके लिए हमें अपने संग को श्रेष्ठ बनाना होगा। ईश्वर जो कि गुणों का सागर है, प्रकृति से परे है, सर्व शक्तिवान है। उसके संग से ही हम बंधनों से मुक्त हो सकते हैं। उसकी याद ही हमें प्रकृति के प्रभाव से मुक्त कर सकती है। उसके लिए सिर्फ गायन पूजन नहीं अपितु मन से उससे जुडऩे की आवश्यकता है। जब हम मन से उसमें समाधिस्थ हो जाते हैं तो उसके जैसे गुणों से भर जाते हैं। इसी को योग की सर्वोच्च स्थिति भी कहा जाता है।
मन से ईश्वर के सर्वोच्च संग का ही नाम है योग : बीके मदनमोहन

