गुरुग्राम। बढ़ती बेरोजग़ारी, महँगाई और आर्थिक असमानता के दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) लोगों के लिए सुरक्षा कवच की तरह था। वंचित वर्गों के लिए रोजग़ार की कानूनी गारंटी था, लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी गलत नीतियों से मनरेगा को कमजोर कर दिया है। उक्त बात कांगे्रस के वरिष्ठ नेता व जिला बार एसोसिएशन के पूर्व प्रधान संतोख सिंह ने मनरेगा को उसके मूल स्वरुप में पुन: बहाल करने की मांग करते हुए कही। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में मनरेगा को लागू किया था, एक अधिकार-आधारित कानून है। यह कानून प्रत्येक ग्रामीण परिवार को मजदूरी रोजगार की मांग करने का वैधानिक अधिकार देता है। अधिनियम के तहत राज्य सरकार 15 दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है, अन्यथा बेरोजगारी भत्ता देय होता है। यह प्रतिवर्ष 5 से 6 करोड़ परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराता है, मजबूरी में होने वाले पलायन को कम करता है, ग्रामीण मजदूरी बढ़ाता है और टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण करता है। मनरेगा के तहत कुल कार्यदिवसों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत है। उन्होंने चेतावनी दी कि बजट-सीमित आवंटन, कृषि के चरम मौसम में कार्य पर प्रतिबंध और मजदूरी सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर करना अनिवार्य रूप से रोजगार में कमी, मजदूरों के शोषण और ग्रामीण संकट में वृद्धि का कारण बनेगा। कार्यक्रम से महात्मा गांधी के नाम को हटाया जाना भी श्रम की गरिमा और ग्राम स्वराज के मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास है, जिन पर मनरेगा आधारित है। उन्होंने मांग की कि मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में पुन: बहाल किया जाए।
मनरेगा को कमजोर करना है सीधा ग्रामीण भारत पर हमला : चौधरी संतोख सिंह

