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गृहस्थ में रहते हुए भी जीया जा सकता हैं संत जीवन : डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज

गुरुग्राम। सूर्य का प्रकाश और हवा चहुंओर फैलते हैं। उसी प्रकार चंचल मन भी सभी तरफ व्यर्थ में घूमता रहता है। इसी को गुमराह, भ्रमित और लक्ष्यहीन मन कहा जाता है और यही गुमराह हुआ मन ही व्यक्ति के जीवन को तबाह कर देता है। उक्त विचार हरिद्वार तपोवन के गीताज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने चैत्र नवरात्र के उपलक्ष्य में धार्मिक संस्था श्री गीता साधना सेवा समिति द्वारा आयोजित 6 दिवसीय श्रीमद् देवी भागवत भक्ति रस सप्ताह के चौथेे दिन प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। महाराज जी ने कहा कि भ्रमित मन दुखों और असफलता का मूल कारण है, जबकि एकाग्र मन सफलता, शांति और आत्म-उद्धार की कुंजी है। मन कूड़ेदान की ओर आकर्षित हो और उद्यान की ओर सोचे तक नहीं तो मन को फूलों की सुगंध का अनुभव क्या और कब होगा। प्रभु दर्शन की जिज्ञासा रखने वाले भक्त को व्यर्थ के दर्शन से मन यानि कि स्वयं को हटाना होगा। महाराज जी ने कहा कि देवी भागवत में विदेहराज जनक और शुकदेव जी के संवाद में राजा जनक कहते हैं कि बन्धन और मोक्ष में मन का बड़ा महत्व है। गृहस्थ या सन्यासाश्रम का महत्व नहीं। गृहस्थ में रहते हुए भी सन्त जीवन हो सकता है और सन्त वेष में भी वह सब कुछ हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। यदि मन को केन्द्र में रख कर सभी उपासनाएं संयम से की जाएं वेष का महत्व होता है। आश्रम के प्रबंधक राजेश गाबा का कहना है कि कार्यक्रम में पंजाबी बिरादरी महासंगठन के अध्यक्ष बोधराज सीकरी, शिव सचदेवा, अमित विरमानी, राम लाल सरला आहुजा आदि ने विधिवत रुप से पूजा-अर्चना की। कार्यक्रम में महाराज की कथा का श्रवण करने के लिए बड़ी संख्या में महिला-पुरुष व युवा साधक पहुंच रहे हैं।