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सुरक्षित बचपन ही मजबूत भारत की नींव

गुरुग्राम। एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और उनके सर्वांगीण विकास के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था करता है। सुरक्षित बचपन ही एक मजबूत और विकसित भारत की असली नींव है। उक्त विचार वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद एडवोकेट ने नाबालिग बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर विस्तृत जानकारी साझा करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत में नाबालिग बच्चों के संरक्षण के लिए कई ऐतिहासिक और बेहद मजबूत कानून बनाए गए हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों को हर प्रकार के शोषण, हिंसा, बाल श्रम, तस्करी, बाल विवाह और यौन अपराधों से सुरक्षित रखना है।अधिवक्ता कैलाश चंद ने बताया कि भारत के संविधान में बच्चों के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 21-ए के तहत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है। इसके साथ ही, राज्य सरकारों को भी बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और बेहतर विकास के लिए विशेष नीतियां बनाने के निर्देश दिए गए हैं।पॉक्सो एक्ट : बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए यह सबसे कड़ा कानून है। इसके तहत बच्चों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर दोषियों के लिए कठोरतम सजा का प्रावधान किया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक और विशेष अदालतों में होती है, जहां बच्चे के हितों को सर्वोपरि रखा जाता है।यह कानून उन बच्चों की ढाल बनता है जो अनाथ, बेसहारा, परित्यक्त या किसी भी प्रकार के शोषण का शिकार हैं। इसके जरिए ऐसे बच्चों की देखरेख, संरक्षण और उनके समाज में पुनर्वास की व्यवस्था की जाती है।बाल श्रम प्रतिषेध अधिनियम : इस कानून के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से किसी भी प्रकार का काम या रोजगार कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अलावा, किशोरों (14 से 18 वर्ष) को किसी भी तरह के खतरनाक उद्योगों में काम पर रखने पर सख्त रोक है।बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 : देश में बाल विवाह को पूरी तरह रोकने के लिए लड़कियों की शादी की उम्र 18 वर्ष और लडक़ों की 21 वर्ष निर्धारित है। बाल विवाह कराने, उसमें सहयोग करने या बढ़ावा देने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।एडवोकेट कैलाश चंद ने स्पष्ट किया कि बच्चों की तस्करी, अपहरण और जबरन मजदूरी जैसे गंभीर अपराधों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता और अन्य विशेष कानूनों में बेहद सख्त सजा तय की गई है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य बाल अधिकार आयोग भी लगातार बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए निगरानी रखते हैं।कानूनी विशेषज्ञ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि केवल सख्त कानून बना देना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए पूरे समाज को जागरूक होना पड़ेगा। माता-पिता, शिक्षक, सामाजिक संस्थाएं और पुलिस-प्रशासन जब तक मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक अपराधों पर पूरी तरह लगाम नहीं कसी जा सकती।